सपा-बसपा गठबंधन से यूं बदलेगा वोटों का गणित

Sat, Jan 12, 2019 2:45 PM

आखिरकार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर अगला लोकसभा चुनाव लड़ने की खबरों पर मुहर लगा ही दी। इसकी औपचारिक घोषणा अखिलेश यादव और मायावती ने कर दी है। दोनों ने 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इस संबंध में अखिलेश यादव का यह बयान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव रहने में उन्हें किसी तरह का कोई फायदा नहीं मिलने वाला था। 

अखिलेश यादव ने अपने बयान में कहा कि उनकी वजह से कांग्रेस को तो वोट मिल जाता है, लेकिन उनका वोट उन्हें नहीं मिल पाता है। ऐसे में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का कोई मतलब ही नहीं बनता। अब जब दो धुर विरोधी पार्टियां उत्तर प्रदेश में एक हो गई हैं, तो निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी की नींद उड़ने वाली है। 

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जबरदस्त वापसी की थी और यहां की अधिकतर सीटें अपने नाम कर ली थी। इस बार जब सपा और बसपा एक हो चुके हैं तो ऐसे में राजनीतिक विशेषज्ञों का यही मानना है कि इससे भाजपा को बहुत बड़ा नुकसान उत्तर प्रदेश में उठाना पड़ सकता है। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भले ही सपा और बसपा को ज्यादा सीटें नहीं मिल सकी थीं, लेकिन इनका वोट प्रतिशत इतना भी खराब नहीं था।

ऐसे में इस बार दोनों पार्टियां जब मिलकर चुनाव लड़ रही हैं तो भाजपा पर इनके गठबंधन का भारी पड़ना तय माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को वोट मिलने की एक बड़ी वजह राम मंदिर का निर्माण भी एजेंडे में शामिल होना था। अब जब सरकार साफ कर चुकी है कि राम मंदिर पर कोर्ट के जरिए ही फैसला लिया जाएगा, तो इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मंदिर ना बनने की स्थिति में भाजपा को वोटों का नुकसान हो सकता है। 

गरीब सवर्णों के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण का संविधान संशोधन विधेयक पारित करवाकर भाजपा ने वोट पाने की कोशिश तो जरूर की है, लेकिन यह तो वक्त ही बताएगा कि सपा-बसपा गठबंधन के सामने भाजपा किस तरह से टिक पाती है।