खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को 'खम्भे' के सहारे खड़ा करने की कोशिश

कोरोना वायरस ने वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस महामारी से मौतों का सिलसिला लगातार जारी है। आंकड़ों में मौतों की संख्या 2.6 लाख के पार तो वहीं संक्रमितों की संख्या लगभग 38 लाख पहुंच गई है। अनेक देशों के अर्थव्यवस्था की हालत भी चरमरा गई है। लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार होकर घर बैठ गए हैं। अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि इस स्थिति से उबरने में लम्बा समय लग सकता है। ऐसे में भारत की बात करें तो आम जनता सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठी है तो सरकार भी बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था को 'खम्भे' के सहारे खड़ा करने में जुट गई है।

एक तरफ कोरोना वायरस से निपटने में करोड़ों का बजट खर्च हो रहा। वहीं दूसरी तरफ जनता को राहत पहुंचाने में भी बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही। ऐसे में सोमवार से शुरू हुए लॉकडाउन के तीसरे चरण में ढिलाई बरतते हुए कुछ छूट दी गई। जिसमें शराब की बिक्री को मिली छूट की खास चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया का माहौल बताता है कि बहुत से लोग इसके विरोध में बातें कर रहे हैं तो वहीं कुछ लोग 'खम्भे' के सहारे अर्थव्यवस्था को खड़े होते देख रहे हैं। किन्तु विडम्बना कि यह 'खम्भा' ना जाने कितने परिवारों का खम्भा गिरा देता है।

सोमवार से शराब की बिक्री पर छूट मिलने के साथ ही लोग सरकार के इस निर्णय की भर्त्सना कर रहे हैं। देश के विभिन्न राज्यों में शराब की दुकानों पर भारी भीड़ देखी जा रही है। सोशल डिस्टेसिंग के नियमों की धज्जियां उड़ाते मदिरालयों पर 'खम्भे' के शौकीनों में खासा उत्साह है। बड़ा सवाल यह भी उठता है कि जब ज़रूरत के सामान बेचने वाले दूसरे छोटे दुकानों को छूट नहीं मिली तो शराब के बिक्री की जरूरत कैसे आन पड़ी। नैतिक आधार पर सरकार के इस फैसले को कितना सही माना जा सकता है?

बहरहाल, जनता और सरकार के अपने-अपने तर्क हैं। किन्तु इस पक्ष से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि पेट्रोल और शराब अर्थव्यवस्था के दो पीलर हैं। दूसरा पक्ष यह भी कि भारत ही नहीं बल्कि कोरोना से प्रभावित अनेक देशों की सरकारें भी बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित हैं। एक तरफ़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की गिरी कीमतें, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर डीजल-पेट्रोल की मांग और बिक्री में भारी गिरावट। ऐसे में तीसरे चरण के लॉकडाउन में राज्यों के भीतर शराब बिक्री की छूट मिलने से अर्थव्यवस्था में हल्का सुधार सम्भव है।

कोविड-19 के संक्रमण को देखते हुए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन सुनिश्चित करने के लिए सरकार और प्रशासन की तरफ से दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। जिसके तहत मास्क या गमछे से चेहरा ढककर बाहर निकलने, शराब की दुकान पर पांच से अधिक की संख्या में भीड़ ना लगाने और एक मीटर की दूरी बनाकर रखने की हिदायत दी गई है। बावजूद इसके दिल्ली, यूपी, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि राज्यों से जारी हो रही तस्वीरों में शराब की दुकानों पर भारी भीड़ और सोशल डिस्टेंसिग का पालन नहीं होता दिख रहा है‌। कुछ जगहों पर तो भारी भीड़ की वजह से दुकान के बंद करने की नौबत आ गई। वहीं कुछ जगहों पर पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा। 

सोमवार से ही सोशल मीडिया पर शराब से सम्बन्धित पोस्ट डालकर लोग व्यंग्य कस रहे हैं। फेसबुक पर शराब की दुकानों के बाहर लगी लम्बी लाईनों की भीड़ के वीडियो और फोटो वायरल हो रहे हैं। लॉकडाउन 3.0 में मिली इस छूट से लेने के देने न पड़ जाएं, ऐसी शंका व्यक्त की जा रही है। बड़ी संख्या में लोग इस निर्णय को आत्मघाती बता रहे हैं।

शराब की अर्थव्यवस्था के गणित को समझें तो यह बात सामने निकलकर आती है कि शराब की बिक्री से यूपी और एमपी जैसे राज्यों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन के बराबर राजस्व की वसूली हो जाती है। उत्तर प्रदेश में हर साल आबकारी टैक्स से 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का राजस्व मिलता है। वहीं मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा लगभग 10 हजार करोड़ का है। हरियाणा में शराब से लगभग 6 हजार करोड़ रूपए की वसूली होती है।

गौरतलब है कि पेट्रोल और शराब को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने के कारण राज्य सरकारें इसकी कीमतें बढ़ाकर राजस्व 'मैनेज' कर लेती हैं। मंगलवार को ही राजधानी दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने शराब पर 70 प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स वसूलना शुरू कर दिया है। यह भी विदित हो कि बीते सत्र 2019-20 में यूपी को 26 हजार करोड़ रुपए, महाराष्ट्र को 24 हजार करोड़ रुपए, तेलंगाना को 21,500 करोड़ रुपये, कर्नाटक को 20 हजार करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल को 11,874 करोड़ रुपये, राजस्थान को 7,800 करोड़ रुपये और पंजाब को 5,600 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी। 

वर्तमान परिस्थिति में पेट्रोल की बिक्री लगभग न के बराबर होने से सरकार के पास शराब की बिक्री से राजस्व सम्भालने का विकल्प मौजूद था। जिसको लेकर अनेक राज्य सरकारों ने तैयारी कर ली थी। वर्ष 2019-20 के अनुसार शराब से राज्यों को करीब 2.48 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई। 2018 में भी 2.17 लाख करोड़ रुपए और 2017 में 1.99 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई थी। अधिकतर राज्यों की 15-30 फीसदी आय शराब से ही होती है।

अब यदि आंकड़ों में घाटे की बात करें तो लॉकडाउन 2 तक प्रतिदिन 700 करोड़ रुपए का नुकसान शराब की बिक्री न होने से हो रहा था। महाराष्ट्र जैसे राज्य में पिछले 42 दिनों से शराब की बिक्री बंद होने से राज्य को लगभग 2 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। ऐसे में राज्य सरकारों ने बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था को दारू के सहारे पटरी पर डगराने की कोशिश की है।

 ~ ( लेखक स्वतंत्र पत्रकार व टिप्पणीकार है )