Ghazipur : कलेक्‍ट्रेट बार एसोसिएशन निर्वाचन के लिए हुआ नामांकन

गाजीपुर। कलेक्‍ट्रेट बार एसोसिएशन सामान्‍य निर्वाचन 2021 के लिए मंगलवार को अध्‍यक्ष पद पर काशीनाथ राय, शंकर सिंह यादव ने पर्चा दाखिल किया। वरिष्‍ठ...
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    गाजीपुर के लाल आलोक रंजन राय ने सिविल सेवा को जीत बढ़ाया परिवार, जिले का मान, यूं पाई सफलता

    गाजीपुर:
    करीब दो दशक पहले की बात है। एक बच्चा अपने बड़े भाई के कंधे पर बैठ गांव की सैर पर था। बच्चा कंधों पर सुकून से बैठा गांव के नजारे देख रहा था, लेकिन बड़े भाई के दिमाग में उथल-पुथल मची हुई थी। बड़े भाई ने प्रशासनिक सेवा की अहम परीक्षा दे रखी थी और उन्हें रिजल्ट की चिंता थी। बड़े भाई इसी सोच में छोटे को कंधे पर बिठा गांव के अपने ट्यूबवेल की तरफ निकल पड़े थे। अचानक उन्होंने कंधे पर बैठे छोटे भाई से पूछा, मेरा सिलेक्शन हो जाएगा? छोटे ने जवाब दिया 75 पर्सेंट हो जाएगा भैया। मासूमियत में डूबे इसे जवाब ने बड़े भाई के तनाव को एक पल में खत्म कर दिया और वह छोटे को लेकर गुनगुनाते हुए घर को लौट पड़े। और समय को देखिए। बड़े भाई को सफलता के लिए आश्वस्त करने वाला वह छोटा भाई आज खुद देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित और कठिन समझे जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा को पास कर अफसर बन गया।

    गाजीपुर के आलोक रंजन राय की कहानी सबके लिए प्रेरणा

    ये कहानी गाजीपुर के चंदनी गांव के रहने वाले आलोक रंजन राय और उनके बड़े भाई व चंदनी पब्लिक स्कूल के डायरेक्टर नवीन राय की है। अपने छोटे भाई की सफलता से भावुक नवीन राय ने न्यूज ब्रीफ संग जब यह किस्सा साझा किया, तो उनकी आंखों में दो दशकों का समय कुछ पलों में ही तैर गया। आज देशभर में सिविल सेवा में सफल अभ्यर्थियों के चर्चे हैं। इन्हीं चर्चाओं में गाजीपुर को भी जगह मिल रही है, जो जिले के लिए गौरव की बात है। गाजीपुर को यह गौरव दिलाने वाले युवा का नाम आलोक रंजन राय है, जिन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा पास कर अपने परिवार का नाम रोशन किया है।

    कर्तव्य पथ पर डंटे रहें, तो देर-सबेर आपको सफल होना ही है

    आलोक रंजन राय गाजीपुर के चंदनी गांव के रहने वाले हैं। इनके पिता विनोद राय जिला विद्यालय निरीक्षक हैं, जिन्हें खुद भी प्रदेश के तेज-तर्रार अफसरों में शुमार किया जाता है। आलोक की यह सफलता गाजीपुर के ही नहीं बल्कि देश के उन मध्यम वर्गीय बच्चों के लिए प्रेरणा है, जिनकी आंखों में कुछ अलग कर गुजरने का ख्वाब तैरता है। आलोक उर्फ इशू इस बात के प्रतीक हैं कि अगर लगन और धैर्य से कर्तव्य पथ पर डंटे रहें, तो देर-सबेर आपको सफल होना ही है। न्यूज ब्रीफ ने इस भव्य सफलता के बाद आलोक से बात की और उनसे इस सफलता का राज जानना चाहा।

    प्रारंभिक पढ़ाई गाजीपुर में ही हुई

    आलोक ने न्यूज ब्रीफ को बताया कि उनकी प्रारंभिक पढ़ाई गाजीपुर से ही पूरी हुई है। न्यू होराइजन स्कूल फिर शाह फैज स्कूल से पढ़ाई के बाद वह वाराणसी चले गए। उन्होंने 10 और 12वीं की पढ़ाई क्रमशः सनबीम भगवानपुर और राज इंग्लिश स्कूल से पूरी की।

    इंजीनियरिंग के बाद इंटर्नशिप में महसूस हुआ कि राह कुछ अलग है

    आलोक बताते हैं कि 12वीं के बाद AIEEE में उन्हें सफलता मिली और एमआईटी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पुणे से उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। इंटर्नशिप के दौरान ही उन्हें महसूस हो गया कि ये फील्ड उनका लक्ष्य नहीं। वह बताते हैं कि पिता विनोद राय को देख और अपने रुझानों की वजह से उन्होंने प्रशासनिक सेवा की तैयारी की लक्ष्य बनाया।

    क्या पढ़ाई के घंटे तय करते हैं सफलता?

    न्यूज ब्रीफ ने आलोक से उनकी पढ़ाई की रूटीन के बारे में जानना चाहा। अक्सर अभिभावक अपने बच्चों पर दिन के ज्यादा घंटे पढ़ाई का दबाव बनाते हैं। हमने आलोक से पूछा कि क्या पढ़ाई के घंटों ने उन्हें सफलता दिलाई? आलोक ने बताया कि उनके हिसाब से पढ़ाई के घंटे अहम नहीं हैं, बल्कि तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स को हर दिन का एक लक्ष्य तय करना चाहिए। टारगेट फिक्स कर पढ़ाई करना सिविल सर्विस में सफलता की बेहतर रणनीति है।

    क्या बिना कोचिंग सिविला सेवा में सफलता मुमकिन नहीं?

    देश में सिविल सेवा की तैयारी कराने वाली हजारों कोचिंग हैं। लाखों बच्चे इनमें पढ़ रहे हैं। कई कोचिंग की फीस अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है। हमने आलोक से यह जानना चाहा कि क्या बिना कोचिंग सफलता पाना मुमकिन नहीं, क्या सेल्फ स्टडी आपको सफल नहीं बना सकती? आलोक ने बताया कि कोचिंग एक मार्गदर्शन देती है, लेकिन इसे करना अनिवार्य नहीं। उनके मुताबिक अगर आपके दोस्त, पीयर ग्रु्प्स सिविल की तैयारी कर रहे हैं, तो उनका एक्सपीरिंयस ज्यादा काम आता है। सेल्फ स्टडी अगर टारगेट बेस्ड तरीके से की जाए तो सफलता पाना मुमकिन है।

    इतनी कठिन परीक्षा ने कभी निराशा की ओर नहीं धकेला?

    सिविला सेवा में सीटें कम हैं और कंपीटिशन तगड़ा। आलोक से हमने जानना चाहा कि क्या कभी उन्हें ऐसा नहीं लगा कि छोड़ो यार बहुत हुआ, या कभी निराशा नहीं हुई? आलोक बताते हैं कि सिर्फ सिविल सेवा ही नहीं बल्कि करियर के हर क्षेत्र में यह फीलिंग कभी न कभी आती ही है। सिविल सेवा में निराशा के भाव के बारे में इसलिए भी ज्यादा सुनने को मिलता है क्योंकि अभ्यर्थी ज्यादा हैं औऱ सफलता के चांस कम। आलोक कहते हैं कि निराशा उन्हें भी होती थी, लेकिन बड़े-संयुक्त परिवार से मिलने वाले प्यार ने उनका हौसला बनाए रखा। वह एक ही सलाह देते हैं कि सकारात्मक भाव से अपने कर्तव्य को पूरा करते रहना चाहिए। सफलता देर-सबेर आपके कदम जरूर चूमती है।

    परिवार से मिले संस्कार ने सफलता का मार्ग प्रशस्त किया

    आलोक बताते हैं कि उनकी सफलता में उनके परिवार का बड़ा योगदान है। जीवन में ऐसे पल सभी के साथ आते हैं, जब निराशा घेरती है। उनके साथ भी ऐसे पल आए। लेकिन कभी बड़े भाइयों तो कभी छोटे भाई-बहनों ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। आलोक के पिता विनोद राय चंदौली जिले में जिला विद्यालय निरीक्षक हैं। आलोक बताते हैं कि पिता ने हमेशा उन्हें बेहतर करने के लिए प्रेरित किया। भारतीय सेना से सेवानिवृत्त व चंदनी पब्लिक स्कूल के मैनेजर दयाशंकर राय और श्री शिवपूजन इन्टर कालेज मलसा गाजीपुर के वरिष्ठ प्रवक्ता विजय शंकर राय, दोनों ही आलोक रंजन राय के बड़े पिता हैं। आलोक बताते हैं कि जब भी उन्हें किसी मोड़ पर मार्गदर्शन की जरूरत होती, ये सभी लोग हमेशा उनके साथ खड़े नजर आते।

    चंदनी पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल और आलोक के बड़े भाई प्रवीण पीयूष राय बताते हैं कि छोटे भाई की सफलता ने उनके परिवार के मान को बढ़ाने का काम किया है। उनका मानना है कि गाजीपुर की नई पीढ़ी को आलोक की .ये सफलता कुछ बेहतर करने की प्रेरणा देगी और उन्हें यह बताएगी कि छोटे शहरों और गांवों से आने वाले बच्चे भी कमाल कर सकते हैं।

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