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गुप्त काल में बेशकीमती थी गाजीपुर की धरती, भव्य इतिहास के इन सबूतों को जानिए

गाजीपुर
गाजीपुर का हर शख्स अपने जिले की कहानी जरूर जानना चाहता है। ऐसे में हम अपने पाठकों के लिए यह पेशकश लेकर आए हैं। लेखों की इस सीरीज में आपको गाजीपुर की कहानी सुनाई जा रही है। हम आपको अपनी खास रिपोर्ट्स में गाजीपुर का इतिहास बताएंगे। इससे पहले हमने आपको गाजीपुर के नाम और जिले को दहेज में देने और मौर्य युग के गाजीपुर की कहानी सुनाई थी। साथ ही महान सम्राट अशोक के गाजीपुर आने का किस्सा भी बताया था।

कहानी शिवमंगल राय की किताब पर आधारित

इस सीरीज की कहानी मुख्य रूप से गाजीपुर के प्रख्यात लेखक स्वर्गीय डॉक्टर शिवमंगल राय की किताब पर आधारित होगी। डेढगांवा गांव के डॉक्टर शिवमंगल राय पश्चिम बंगाल के हावड़ा में प्रधानाध्यापक रहे। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कॉलेजों में प्रवक्ता भी रहे। उन्होंने एक पूरी किताब ही लिखी है जिसका नाम है ‘गाजीपुर का इतिहास’। हमारे पास वो किताब मौजूद है। तो चलिए आज आपको बताते हैं कि भारत के महान वंशों में से एक गुप्त वंश के समय गाजीपुर कैसा था।

समुद्रगुप्त ने गाजीपुर को किया था गुप्त वंश के अधीन

Saidpur Symbolizes Extraordinary Glory Of Gupta Period Emperor Skandgupta  Slept On Ground Here Bhitri Ghazipur - गुप्त काल के असाधारण गौरव का प्रतीक  है सैदपुर का 'भीतरी', यहां जमीन पर सोए थे

किताब के मुताबिक श्रीगुप्त ने 275 ई में गुप्त वंश के शासन की स्थापना की थी। बाद में चंद्रगुप्त प्रथम के पुत्र समुद्रगुप्त ने गुप्त वंश को बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा की थी। उन्होंने ही अपने विजयाभियान के अंतर्गत गाजीपुर जनपद के भूखंड को गुप्त साम्राज्य में मिलाया था। उस दौर में साहित्य और कला को काफी प्रोत्साहन मिला था। चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के समय चीनी यात्री फाहियान भारत घूमने आए थे। उन्होंने लिखा है कि तब प्रजा सुखी और संपन्न थी। नगरों में सरकारी अस्पताल थे। धर्मशालाओं में मुफ्त भोजन दिया जाता था।

कुमारगुप्त ने गाजीपुर में शिवलिंग की स्थापना की थी

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गाजीपुर के संदर्भ में कुमारगुप्त का काल काफी अहम रहा। किताब के मुताबिक कुमारगुप्त ने सैदपुर के निकट भितरी में शिवलिंग की स्थापना और मूर्तियों का निर्माण कराया था। 1837 और 1863 में जनरल कनिंघम ने भीतरी और सैदपुर के भग्नावशेषों का निरीक्षण किया। उन्हें सभी टीले ईंटों, चित्रकारी किए गए पत्थरों, टूटे स्तंभों और मूर्तियों से भरे मिले। ऐसी ईंटें मिलीं, जिनपर कुमार गुप्त का नाम लिखा था। शेरिंग, हार्न और ओल्डहम जैसे लोगों ने भी इन स्थानों का निरीक्षण किया। सबका यही मत था कि यह क्षेत्र गुप्त सम्राटों का एक प्रमुख केंद्र था।

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